वो तवायफ़
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसलिए
दुनिया को ज़्यादा जानती है
- उसके कमरे में
हर मज़हब के भगवान की
एक-एक तस्वीर लटकी है
ये तस्वीरें
लीडरों की तक़्रीरों की तरह नुमाइशी नहीं
उसका दरवाज़ा
रात गए तक
हिन्दू
मुस्लिम
सिख
ईसाई
हर ज़ात के आदमी के लिए खुला रहता है
ख़ुदा जाने
उसके कमरे की सी कुशादगी
मस्जिद
और
मन्दिरों के आँगन में कब पैदा होगी!
-निदा फ़ाज़ली
मायने:- कुशादगी – उदारता, फैलावइन्सान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
इन्सान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी।
खूँखार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं
शहरों में बियाबान यहाँ भी है वहाँ भी।
हिन्दू भी मज़े में है मुसलमाँ भी मज़े में
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी।
- निदा फ़ाज़ली
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ
जी मचलता था एक एक शै पर मगर
जेब खाली थी कुछ मोल ले न सका
लौट आया लिए हसरतें सैकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूँ तो एक एक दुकान मोल लूँ
आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ
नारसाई का अब दिल में धड़का कहाँ
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ
- इब्ने इंशा
मायने :- नारसाई – प्राप्त न होना, पहुँच ना होना