सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

वो तवायफ़
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसलिए
दुनिया को ज़्यादा जानती है
- उसके कमरे में
हर मज़हब के भगवान की
एक-एक तस्वीर लटकी है
ये तस्वीरें
लीडरों की तक़्रीरों की तरह नुमाइशी नहीं
उसका दरवाज़ा
रात गए तक
हिन्दू
मुस्लिम
सिख
ईसाई
हर ज़ात के आदमी के लिए खुला रहता है
ख़ुदा जाने
उसके कमरे की सी कुशादगी
मस्जिद
और
मन्दिरों के आँगन में कब पैदा होगी!

-निदा फ़ाज़ली

मायने:- कुशादगी – उदारता, फैलाव

इन्सान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी

इन्सान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी।

खूँखार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं
शहरों में बियाबान यहाँ भी है वहाँ भी।

हिन्दू भी मज़े में है मुसलमाँ भी मज़े में
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी।

- निदा फ़ाज़ली

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ
जी मचलता था एक एक शै पर मगर

जेब खाली थी कुछ मोल ले न सका
लौट आया लिए हसरतें सैकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूँ तो एक एक दुकान मोल लूँ
आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ

नारसाई का अब दिल में धड़का कहाँ
पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ
- इब्ने इंशा

मायने :- नारसाई – प्राप्त न होना, पहुँच ना होना


क़ौमी एकता

वो तवायफ़
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसलिए
दुनिया को ज़्यादा जानती है
- उसके कमरे में
हर मज़हब के भगवान की
एक-एक तस्वीर लटकी है
ये तस्वीरें
लीडरों की तक़्रीरों की तरह नुमाइशी नहीं
उसका दरवाज़ा
रात गए तक
हिन्दू
मुस्लिम
सिख
ईसाई
हर ज़ात के आदमी के लिए खुला रहता है
ख़ुदा जाने
उसके कमरे की सी कुशादगी
मस्जिद
और
मन्दिरों के आँगन में कब पैदा होगी!

-निदा फ़ाज़ली

मायने:- कुशादगी – उदारता, फैलाव

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010



अब्राहम लिंकन (भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति) की बेटे के अध्यापक को लिखी गयी पाती
श्रद्देय गुरुजी,
मैं जानता हूँ कि उसे सीखना होगा
कि दुनिया में सभी लोग न्यायप्रिय नहीं होते,
सभी लोग सच्चे नहीं होते
किंतु उसे यह भी सिखाएं कि जहां
एक बदमाश होता है वहां एक नायक भी होता है
उसे यह भी बताएं कि
हर स्वार्थी नेता के जवाब में एक समर्पित नेता भी होता है
उसे बताइए कि जहाँ एक दुश्मन होता है वहां
एक दोस्त भी होता है
अगर आप कर सकते हैं
तो उसे ईर्ष्या से बाहर निकालें
खामोश हसीं का रहस्य बताएं
जल्दी यह सीखने दें कि गुंडई करने वाले
बहुत जल्दी चरण स्पर्श करते हैं
अगर पढ़ा सकें तो उसे किताबों के आश्चर्य के बारे में पढ़ाएं
उसे इतना समय भी दें कि
वह आसमान में उड़ती चिड़िया के धूप में
उड़ती मधुमक्खियों के और हरे पर्वतों पर खिले फूलों
के रहस्यों के बारे में सोच सके
उसे स्कूल में यह भी सिखाएं कि
नकल करने से ज्यादा सम्मानजनक फ़ेल हो जाना है
उसे अपने विचारों में विश्वास करना सिखाएं तब भी
जब सब उसे ग़लत बताएं
उसे विनम्र लोगों से विनम्र रहना
और कठोर व्यक्ति से कठोर व्यवहार करना सिखाएं
मेरे बेटे को ऐसी ताकत दें कि
वह उस भीड़ का हिस्सा न बने जहां
हर कोई खेमे में शामिल होने में लगा है
उसे सिखाएं कि वह सब की सुने लेकिन
उसे यह भी बताएं कि
वह जो कुछ भी सुने
उसे सच्चाई की छन्नी पर छाने और
उसके बाद जो अच्छी चीज बचे उसे ही ग्रहण करे
अगर आप सिखा सकतें हैं तो उसे सिखाएं कि
जब वह दुखी हो तो रोए नहीं
उसे सिखाएं कि आंसू आना शर्म की बात नहीं
उसे सिखाएं कि निंदकों का कैसे मजाक उडाया जाए
और ज्यादा मिठास से कैसे सावधान रहा जाए
उसे बताएं कि अपनी बुद्धि पर घमंड करने से बचे लेकिन
अपने ह्रदय और आत्मा को किसी कीमत पर न बेचे
उसे सिखाएं कि
एक चीखती भीड़ के आगे अपने कान बंद कर ले
और अगर वह अपने को सही समझता है तो
उठ कर लड़े
आप उसे कुछ सिखाना चाहते हैं तो उससे विनम्रता से पेश आएं लेकिन
उसे छाती से न लगाए रखें क्योंकि
आग में ही तप कर लोहा मजबूत बनता है
उसमे साहस आने दें,
उसे अधीर बनने दें,
उसमे बहादुर बनने का धैर्य आने दें
उसे सिखाएं कि वह अपने में गहरा विश्वास रखे
क्योंकि तभी वह मानव जाति में गहरा विश्वास रखेगा
यह एक बड़ी फरमाइश है ...पर देखिये
आप क्या कर सकते हैं क्योंकि यह छोटा बच्चा मेरा बेटा है !
अब्राहम लिंकन (भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति)

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

जब नींद नहीं आती होगी!


क्या तुम भी सुधि से थके प्राण ले-लेकर अकुलाती होगी!
जब नींद नहीं आती होगी!
दिनभर के कार्य-भार से थक जाता होगा जूही-सा तन,
श्रम से कुम्हला जाता होगा मृदु कोकाबेली-सा आनन।
लेकर तन-मन की श्रांति पड़ी होगी जब शय्या पर चंचल,
किस मर्म-वेदना से क्रंदन करता होगा प्रति रोम विकल
आँखों के अम्बर से धीरे-से ओस ढुलक जाती होगी!
जब नींद नहीं आती होगी!
जैसे घर में दीपक न जले ले वैसा अंधकार तन में,
अमराई में बोले न पिकी ले वैसा सूनापन मन में,
साथी की डूब रही नौका जो खड़ा देखता हो तट पर -
उसकी-सी लिये विवशता तुम रह-रह जलती होगी कातर।
तुम जाग रही होगी पर जैसे दुनिया सो जाती होगी!
जब नींद नहीं आती होगी!
हो छलक उठी निर्जन में काली रात अवश ज्यों अनजाने,
छाया होगा वैसा ही भयकारी उजड़ापन सिरहाने,
जीवन का सपना टूट गया - छूटा अरमानों का सहचर,
अब शेष नहीं होगी प्राणों की क्षुब्ध रुलाई जीवन भर!
क्यों सोच यही तुम चिंताकुल अपने से भय खाती होगी?
जब नींद नहीं आती होगी!

अँधेरे का दीपक



है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,
भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,
अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?
- बच्चन

स्वतंत्रता का दीपक


घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रतादिया,
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!

यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है!

तीनचार फूल है, आसपास धूल है
बाँस है, बबूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से, फूँक दे, झकोर दे,
कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!
यह किसी शहीद का पुण्य प्राणदान है!

झूमझूम बदलियाँ, चूमचूम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रहीं, हलचलें मचा रहीं!
लड़ रहा स्वदेश हो, शांति का न लेश हो
क्षुद्र जीतहार पर, यह दिया बुझे नहीं!
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है!
- गोपालसिंह नेपाली

आती तो है


इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।